अद्वैत दर्शन का सर्वोच्च शिखर: ‘योग वाशिष्ठ: महारामायण’ – एक जीवन-परिवर्तक पुस्तक की समीक्षा
क्या आपने कभी एकांत में बैठकर स्वयं से यह प्रश्न किया है कि – “मैं कौन हूँ? यह संसार क्या है? और जीवन की इस अंतहीन दौड़ का अंतिम लक्ष्य क्या है?”
आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य ने भौतिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अकल्पनीय ऊँचाइयों को छू लिया है, वहीं आंतरिक शांति के मामले में वह आज भी उतना ही दरिद्र है। तनाव, अवसाद, मृत्यु का भय और भविष्य की चिंताएँ आज के मनुष्य को भीतर ही भीतर खोखला कर रही हैं। हम मृगतृष्णा के जल से अपनी प्यास बुझाने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। ऐसे कोलाहलपूर्ण और विक्षिप्त समय में, यदि कोई एक ग्रंथ मानव चेतना को अज्ञान की इस गहरी निद्रा से झकझोर कर जगा सकता है, तो वह है – ‘योग वाशिष्ठ’ (महारामायण)।
लेखक नवीन गोयल द्वारा आधुनिक, कथात्मक और अत्यंत ओजस्वी हिंदी में प्रस्तुत की गई यह पुस्तक, मानव इतिहास के सबसे महान और गूढ़ आध्यात्मिक संवाद को पुनर्जीवित करती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एक वैरागी राजकुमार और एक सिद्ध गुरु
कल्पना कीजिए त्रेता युग के अयोध्या के उस भव्य राजदरबार की। एक ओर चक्रवर्ती सम्राट दशरथ, तपोनिधि विश्वामित्र और अनेक ऋषि-मुनि विराजमान हैं, और दूसरी ओर खड़े हैं युवा राजकुमार राम। परंतु ये वे राम नहीं हैं जिन्हें हम एक राजा या मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं; ये वे राम हैं जिनके हृदय में संसार की नश्वरता, मृत्यु की अनिवार्यता और जीवन की असारता को देखकर भयंकर ‘वैराग्य’ और ‘विषाद’ उत्पन्न हो गया है।
राम के इन मर्मभेदी प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ज्ञान के अगाध सूर्य, ब्रह्मर्षि वाशिष्ठ अपने आसन से उठते हैं। और यहीं से जन्म होता है उस ब्रह्मांडीय संवाद का, जो मानव चेतना के सबसे सूक्ष्म आवरणों को छिन्न-भिन्न कर देता है।
पुस्तक के मुख्य दार्शनिक स्तंभ
यह पुस्तक केवल कुछ नैतिक उपदेशों या धार्मिक कर्मकांडों का संग्रह नहीं है। यह अद्वैत वेदान्त का वह सर्वोच्च शिखर है, जिसके आगे विश्व के बड़े-से-बड़े दर्शनशास्त्र बौने प्रतीत होते हैं। नवीन गोयल जी ने इस पुस्तक में इन अत्यंत गूढ़ सिद्धांतों को इतनी सरलता से पिरोया है कि एक साधारण पाठक भी सीधे सत्य से जुड़ जाता है:
१. मन ही एकमात्र रचयिता है (दृष्टि-सृष्टि वाद)
यह पुस्तक आधुनिक ‘क्वांटम फिजिक्स’ और ‘सिमुलेशन थ्योरी’ से हज़ारों वर्ष पूर्व यह उद्घोष करती है कि यह ठोस प्रतीत होने वाला ब्रह्मांड बाहर कहीं विद्यमान नहीं है। यह केवल आपके ‘मन’ का एक सघन संकल्प है। जब तक आपकी दृष्टि है, तभी तक यह सृष्टि है। मन ही वह मायावी जादूगर है जो अपनी कल्पना से इस संसार को रचता है और फिर स्वयं ही उसमें फँसकर सुख-दुख भोगता है।
२. संसार एक दीर्घकालिक स्वप्न (अजातवाद)
महर्षि वाशिष्ठ सिद्ध करते हैं कि जिस प्रकार स्वप्न का संसार अत्यंत वास्तविक प्रतीत होता है, परंतु आँख खुलते ही शून्य हो जाता है; ठीक उसी प्रकार यह ‘जाग्रत अवस्था’ भी एक लंबा स्वप्न ही है। सत्य तो यह है कि परमार्थतः इस सृष्टि की कभी उत्पत्ति हुई ही नहीं है। केवल एक ‘अखंड चिदाकाश’ (शुद्ध चेतना) ही सत्य है।
कहानियों का इंद्रजाल: जो आपके तर्कों को भेद देगा
‘योग वाशिष्ठ: महारामायण’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कथाएँ हैं। यह दर्शन शुष्क नहीं है। लेखक ने मूल ग्रंथ की उन अत्यंत विस्मयकारी और विज्ञान-गल्प को भी मात देने वाली कथाओं को बहुत ही सजीव रूप में प्रस्तुत किया है:
रानी लीला की कथा: जो मृत्यु के पश्चात के जीवन और एक ही स्थान पर अनंत ब्रह्मांडों की समकालीन उपस्थिति का रहस्य खोलती है।
राजा लवण का इंद्रजाल: जो सिद्ध करता है कि समय (काल) की कोई सत्ता नहीं है; मन के भ्रम में कुछ क्षणों में ही साठ वर्ष का जीवन भोगा जा सकता है।
पाषाणाख्यान: यह कथा बताती है कि एक छोटे से जड़ पत्थर के भीतर भी करोड़ों ब्रह्मांड स्थित हैं, क्योंकि चेतना (आत्मा) की कोई सीमा नहीं है।
आधुनिक जीवन के लिए क्यों आवश्यक है?
अनेक लोगों को लगता है कि अद्वैत दर्शन संसार छोड़कर हिमालय जाने की शिक्षा देता है। परंतु यह पुस्तक इस भ्रांति को तोड़ती है। राजा जनक और भक्त प्रह्लाद के प्रसंगों के माध्यम से यह पुस्तक सिखाती है कि सच्चा संन्यास भौतिक वस्तुओं का नहीं, अपितु ‘अहंकार’ का परित्याग है।
आप अपने कार्यालय में, अपने परिवार के बीच और अपने दैनिक संघर्षों में रहते हुए भी एक ‘जीवन्मुक्त’ की भाँति कैसे जी सकते हैं, यह कला महर्षि वाशिष्ठ सिखाते हैं। यह पुस्तक सिखाती है कि कर्म करते हुए भी भीतर से पूर्णतः अकर्ता और शांत (उपशम) कैसे रहा जाए।
निष्कर्ष
लेखक नवीन गोयल ने अपने अथाह आध्यात्मिक चिंतन और उत्कृष्ट साहित्यिक शैली से इस प्राचीन संस्कृत ग्रंथ को आधुनिक पाठकों के लिए एक ‘संजीवनी’ में परिवर्तित कर दिया है। भाषा इतनी शुद्ध, प्रवाहमयी और प्रज्वलित है कि पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात् महर्षि वाशिष्ठ आपके ही अंतःकरण के संशयों का निवारण कर रहे हों।
यदि आप जीवन की निरर्थक दौड़ से थक चुके हैं, यदि आप ‘मैं कौन हूँ?’ के वास्तविक उत्तर की खोज में हैं, और यदि आप उस ‘परम विश्राम’ और अखंड आनंद (तुरीयावस्था) का अनुभव करना चाहते हैं – तो ‘योग वाशिष्ठ: महारामायण’ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि आपकी आत्मा के लिए एक साक्षात् मोक्ष का द्वार है।
अज्ञान की निद्रा को तोड़ें और अपने अनंत आत्म-स्वरूप में जागृत हों। आज ही इस महान ग्रंथ को अपनी पठन-सूची का हिस्सा बनाएँ!
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