अद्वैत वेदांत का सर्वोच्च सिंहनाद: ‘ऋभु गीता’ – एक पुस्तक जो आपके अज्ञान को भस्म कर देगी
क्या आप कभी एकांत में बैठकर यह विचार करते हैं कि “मैं कौन हूँ?” या “इस निरंतर भागती हुई दुनिया और जन्म-मृत्यु के चक्र का वास्तविक सत्य क्या है?”
आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के चरम शिखर पर पहुँच चुका है। हमारे पास सुख के समस्त साधन उपलब्ध हैं, परंतु फिर भी भीतर एक अजीब सी शून्यता, एक अज्ञात भय और एक गहरी अशांति बनी रहती है। हम शांति को बाहरी वस्तुओं, रिश्तों और सफलताओं में खोजते हैं, ठीक उस कस्तूरी मृग के समान जो अपनी ही नाभि की सुगंध को पूरे वन में खोजता फिरता है।
इस भटकाव को सदा के लिए समाप्त करने और मनुष्य को उसके वास्तविक परमानंद स्वरूप से परिचित कराने के लिए, प्रख्यात लेखक नवीन गोयल द्वारा रचित एक अत्यंत दुर्लभ और क्रांतिकारी ग्रंथ प्रस्तुत हुआ है – ‘ऋभु गीता: शिव रहस्य का गूढ़तम तत्व’।
‘ऋभु गीता’ क्या है?
सनातन धर्म के अथाह वाङ्मय में ‘शिव रहस्य पुराण’ का एक अत्यंत गुह्यतम (रहस्यमयी) स्थान है। इसी पुराण के हृदय से ‘ऋभु गीता’ का प्राकट्य हुआ है। यह कोई साधारण कथा या कर्मकाण्ड की मार्गदर्शिका नहीं है। यह अद्वैत वेदांत का वह सर्वोच्च और प्रहारक उपदेश है, जो किसी भी प्रकार के द्वैत (मैं और ईश्वर अलग हैं) को एक ही झटके में नकार देता है।
यह ग्रंथ भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र, परमहंस ज्ञानी महर्षि ऋभु और उनके प्रकांड विद्वान परंतु अहंकार-ग्रस्त शिष्य निदाघ के मध्य हुए एक अत्यंत मार्मिक संवाद पर आधारित है।
एक अद्भुत प्रसंग: जब गुरु ने देहाती वेश धारण किया
पुस्तक का सबसे रोमांचक मोड़ वह है, जब महर्षि ऋभु देखते हैं कि उनका शिष्य निदाघ शास्त्रों के अपार ज्ञान और कर्मकाण्डों के बोझ तले दबकर अपना वास्तविक ‘शिव-स्वरूप’ भूल चुका है। निदाघ के ज्ञानाभिमान (पांडित्य के अहंकार) को तोड़ने के लिए महर्षि ऋभु एक मलिन और फटे-पुराने वस्त्रों वाले ग्रामीण का वेश धारण कर उसके नगर में आते हैं।
जब निदाघ राजा की शोभायात्रा देखते हुए कहता है कि “राजा ‘ऊपर’ बैठा है और प्रजा ‘नीचे’ खड़ी है”, तब वह मलिन देहाती एक अत्यंत भेदक प्रश्न करता है – “यह ‘ऊपर’ और ‘नीचे’ क्या है? और वह ‘मैं’ कौन है जो स्वयं को ऊपर मान रहा है?” इसी एक प्रश्न से निदाघ के अहंकार का विशाल दुर्ग ताश के पत्तों की तरह ढह जाता है, और आरंभ होता है वेदांत का वह महा-उपदेश जो जीव को सीधे साक्षात् परब्रह्म के आसन पर बैठा देता है।
इस ग्रंथ की प्रमुख शिक्षाएं जो आपका जीवन बदल देंगी:
१. देह-अभिमान का नाश: यह पुस्तक अत्यंत तार्किक रूप से सिद्ध करती है कि आप यह पंचमहाभूतों से बना नश्वर शरीर नहीं हैं। जो शरीर प्रतिक्षण बदल रहा है और जो मृत्यु के बाद भस्म हो जाएगा, वह आपका सत्य कैसे हो सकता है? आप तो वह ‘अलिप्त साक्षी’ हैं जो इस शरीर को देख रहा है।
२. मन और संकल्प की भ्रांति: आपके सारे दुख, भय और संसार का निर्माण आपके ही ‘मन के संकल्पों’ से हुआ है। जैसे स्वप्न में मन ही बाघ बन जाता है और मन ही भयभीत व्यक्ति, वैसे ही यह जाग्रत संसार भी एक ‘दीर्घ स्वप्न’ है।
३. नेति-नेति का अमोघ अस्त्र: संसार के प्रपंचों और विचारों को नकारने की विधि। “यह शरीर मैं नहीं, यह मन मैं नहीं” – इस नकारात्मक मार्ग से उस ‘महामौन’ तक कैसे पहुँचें, जहाँ केवल परमानंद शेष रहता है, यह इस पुस्तक का प्राण है।
४. निरंतर आत्म-स्मरण (निदिध्यासन): संसार को छोड़कर हिमालय जाने की आवश्यकता नहीं है। इस ग्रंथ में ‘सहज समाधि’ का मार्ग बताया गया है, जहाँ आप सांसारिक कार्य करते हुए भी भीतर से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ) के बोध में स्थिर रह सकते हैं।
श्री रमण महर्षि और ऋभु गीता
इस प्राचीन ग्रंथ की प्रासंगिकता आधुनिक युग में इसलिए भी अत्यंत बढ़ जाती है, क्योंकि अरुणाचल के महान परमहंस संत भगवान श्री रमण महर्षि ने इसे आत्म-साक्षात्कार का सबसे अचूक साधन माना है। उनका स्पष्ट उद्घोष था कि ऋभु गीता के अद्वैत वाक्यों का केवल पाठ करने मात्र से ही साधक का मन स्वतः ‘निर्विचार अवस्था’ (समाधि) में चला जाता है।
आपको यह पुस्तक क्यों पढ़नी चाहिए?
लेखक नवीन गोयल ने संस्कृत के इस अत्यंत गूढ़ दर्शन को जिस प्रकार एक प्रवाहमयी, कथात्मक और विशुद्ध साहित्यिक हिंदी में पिरोया है, वह अद्भुत है। यह पुस्तक जटिल दार्शनिक सिद्धांतों का नीरस अनुवाद नहीं है; यह एक ऐसी जीवंत यात्रा है जो सीधे आपके हृदय पर प्रहार करती है।
यदि आप ध्यान के मार्ग पर हैं, यदि आप सत्य के अन्वेषक हैं, या यदि आप जीवन के दुखों और व्यर्थ की दौड़ से मुक्त होकर एक शाश्वत विश्राम चाहते हैं, तो ‘ऋभु गीता: शिव रहस्य का गूढ़तम तत्व’ आपके लिए ही रची गई है।
यह कोई ऐसी पुस्तक नहीं है जिसे एक बार पढ़कर पुस्तकालय में सजा दिया जाए। यह एक ‘ध्यान-प्रक्रिया’ है, जिसे आपको प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा पढ़ना है, उस पर मनन करना है और उसे जीना है।
अपने अज्ञान की निद्रा से जागें! आज ही इस अमृतमयी ग्रंथ को अपनी आध्यात्मिक यात्रा का सारथी बनाएं और अनुभव करें कि आप कोई तुच्छ जीव नहीं, अपितु साक्षात् सच्चिदानंद परब्रह्म हैं।
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